हम जिन्हें राज़दाँ बना बैठेवो सभी दुश्मनों में जा बैठेतीरगी छा गयी निगाहों परआप चेहरा छुपा के क्या बैठेमुख़्तलिफ़ नस्ल थी परिन्दों कीदोनों पागल थे दिल लगा बैठेखा गया आब सब सफ़ीनों कोरह गए सारे नाख़ुदा बैठेआप मेरा हदफ़ नहीं थे परआप ख़ुद दरमियान आ बैठेदेखना शक्ल शेख़ साहब कीआ के मसनद पे जब ख़ुदा बैठेजिन दिमाग़ों में ज़ोम बैठा होउनमें किस तरह मशवरा बैठेहो गए बज़्म में सभी तन्हावो हमारे क़रीब क्या बैठेपाँव फैलाए था पड़ा दरवेशसर झुकाए थे बादशा बैठेजो हों बैठे दुआ के साये मेंउन चराग़ों पे क्या हवा बैठेख़्वाब सब रेत के घरौंदे थेपहली बारिश में भरभरा बैठेजिनका पेशा फ़रेब था वो भीज़िन्दगी से फ़रेब खा बैठे
किताबों से निकल कर तितलियाँ ग़ज़लें सुनाती हैं... टिफ़िन रखती है मेरी माँ तो बस्ता मुस्कुराता है...
शनिवार, 13 अगस्त 2022
ग़ज़ल-5/ हम जिन्हें राज़दाँ बना बैठे
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