शनिवार, 13 अगस्त 2022

ग़ज़ल-5/ हम जिन्हें राज़दाँ बना बैठे

हम जिन्हें राज़दाँ  बना बैठे
वो सभी दुश्मनों में जा बैठे

तीरगी छा गयी निगाहों पर
आप चेहरा छुपा के क्या बैठे

मुख़्तलिफ़ नस्ल थी परिन्दों की
दोनों पागल थे दिल लगा बैठे

खा गया आब सब सफ़ीनों को
रह गए सारे नाख़ुदा बैठे

आप मेरा हदफ़ नहीं थे पर
आप ख़ुद दरमियान आ बैठे

देखना शक्ल शेख़ साहब की 
आ के मसनद पे जब ख़ुदा बैठे

जिन दिमाग़ों में ज़ोम बैठा हो
उनमें किस तरह मशवरा बैठे

हो गए बज़्म में सभी तन्हा
वो हमारे क़रीब क्या बैठे

पाँव फैलाए था पड़ा दरवेश
सर झुकाए थे बादशा बैठे

जो हों बैठे दुआ के साये में
उन चराग़ों पे क्या हवा बैठे

ख़्वाब सब रेत के घरौंदे थे
पहली बारिश में भरभरा बैठे

जिनका पेशा फ़रेब था वो भी
ज़िन्दगी से फ़रेब खा बैठे

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