शनिवार, 13 अगस्त 2022

ग़ज़ल-4/ तलाशता हूँ मैं कोई नगर उदासी का

तलाशता हूँ मैं कोई नगर उदासी का
कि दिल को चाहिए अच्छा सा घर उदासी का

क़लम ही तोड़ दिया क्या नसीब का ऐ रब !
मेरे नसीब में लिखकर सफ़र उदासी का

ख़ुशी के फूल खिलेंगे ये सोचते थे हम
वफ़ा के पेड़ पे आया समर उदासी का

अगर वो साथ नहीं दे सका तो दुख क्या है
सभी के बस का नहीं है सफ़र उदासी का

मेरा वजूद निगल लेगी या उदासी ये
या मारिका मैं करूँगा ये सर उदासी का

ये किस ने फूँक दी मेरे सुकून की दुनिया
ये किस ने दिल में रखा है शरर उदासी का

ग़ज़ल के बहर में उतरे बहुत से ग़ोता-ख़ोर
मिला 'सिराज' को लेकिन गुहर उदासी का

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