बेसाख़्ता शमशीर पलट म्यान में आईगुलदस्ते लिए फ़ौज वो मैदान में आईइल्हाम उतरता है पयम्बर पे किसी ज्यूँचाहत तेरी ऐसे दिले वीरान में आईकुछ राज़ सिवा रब के नहीं जानता कोईहर बात नहीं खुल के है क़ुरआन में आईगलियों से गुज़रते हुए चौंक उठता हूँ अक्सरजैसे तेरी आवाज़ मेरे कान में आईअब जा के कहीं ऑन हुआ फ़ोन किसी काअब जा के कहीं जान मेरी जान में आईलहजा हुआ तुलसी का मेरे खुरदरा कैसेतल्ख़ी ये भला क्यूँ मेरे रसखान में आईनाक़िद तू कहेगा मुझे शागिर्द बना लेंये शाइरी जिस दिन तेरे संज्ञान में आई
किताब: क्या तुम्हें याद कुछ नहीं आता
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