ख़याल कब से छुपा के ये मन में रक्खा है
मेरा क़रार तुम्हारे बदन में रक्खा है
जो अस्ल शय थी ख़ला में वो कब की जज़्ब हुई
वो कुछ नहीं है छिपा जो कफ़न में रक्खा है
ये वस्ल चाहने वालों को कौन समझाए
वो राहतों में कहाँ जो घुटन में रक्खा है
हम अपने बच्चों की ख़ातिर सफ़र में रहते हैं
सुकून उनका हमारी थकन में रक्खा है
वही मिटाएगा क़िस्मत से मेरी तारीकी
वो जिसने चाँद बनाकर गगन में रक्खा है
किताब: क्या तुम्हें याद कुछ नहीं आता
पृष्ठ संख्या: 48
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