बुधवार, 17 अगस्त 2022

नज़्म-3/ तख़्लीक़


तख़्लीक़

वो मुझसे कहती थी
मेरे शायर !!
ग़ज़ल सुनाओ
जो अनसुनी हो
जो अनकही हो
कि जिसके अहसास अनछुए हों

हों शेर ऐसे
कि पहले मिसरे को सुन के मन में
खिले तजस्सुस का फूल ऐसा
मिसाल जिसकी अदब में सारे कहीं भी ना हो

मैं उससे कहता था मेरी जानां !!
ग़ज़ल तो कोई ये कह चुका है
ये मोजिज़ा तो खुदा ने मेरे दुआ से पहले ही कर दिया है

तमाम आलम की सबसे प्यारी
जो अनकही सी
जो अनसुनी सी
जो अनछुई सी
हसीं ग़ज़ल है-
'वो मेरे पहलू में जल्वा-गर है'

14 जनवरी 2016

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