रविवार, 14 अगस्त 2022

ग़ज़ल-10/ हमीं वफ़ाओं से रहते थे बेयकीन बहुत

हमीं वफ़ाओं से रहते थे बेयकीन बहुत
दिलो निगाह में आये थे महजबीन बहुत

वो एक शख़्स जो दिखने में ठीक-ठाक सा था
बिछड़ रहा था तो लगने लगा हसीन बहुत

तू जा रहा था बिछड़ के तो हर क़दम पे तेरे
फ़िसल रही थी मेरे पाँव से ज़मीन बहुत

वो जिसमें बिछड़े हुए दिल लिपट के रोते हैं
मैँ देखता हूँ किसी फ़िल्म का वो सीन बहुत

तेरे ख़याल भी दिल से नहीं गुज़रते अब
इसी मज़ार पे आते थे ज़ायरीन बहुत

तड़प तड़प के जहाँ मैंने जान दी “फ़ैसल”
खड़े हुए थे वहीं पर तमाशबीन बहुत


किताब: क्या तुम्हें याद कुछ नहीं आता

पृष्ठ संख्या: 58

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