साँसों के मर्तबान में कुछ भी नहीं रहा
तुम बिन तो जिस्मो जान में कुछ भी नहीं रहा
उस से थीं सारी रौनकें जब वो नहीं रही
ख़्वाबों के इस मकान में कुछ भी नहीं रहा
यादों के गुल भी ज़हन की शाख़ों से गिर गए
चाहत के गुलसितान में कुछ भी नहीं रहा
मेरे लिए वो शख़्स ही मेरा जहान था
मेरे लिए जहान में कुछ भी नहीं रहा
इक बार उनका ध्यान जो आया हमें 'सिराज'
फिर उस के बाद ध्यान में कुछ भी नहीं रहा
किताब: क्या तुम्हें याद कुछ नहीं आता
पृष्ठ संख्या: 92
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