रंग
वो दिन वो लम्हा
मेरी तरह ही
ज़रूर तुमको भी याद होगा
बसंत की ख़ुशबुओं में भीगी
खिली-खिली
वो हसीं दोपहरी
वो गार्डन के क़रीब खिड़की के नीले शीशे पे रक़्स करती
हरी-सुनहरी-सफ़ेद उन तितलियों को छूते हुए जो
टेबल पे रक्खी बोतल का मुझसे पानी
बिखर गया था
वो पास रक्खे तुम्हारे मेहँदी के
उस पियाले में भर गया था
कि जिससे तुम इन
गुलाब जैसी हथेलियों का
सिंगार करने को मुंतज़िर थीं
ये देख कर के तुम्हारे गालों पे
रंग ग़ुस्से का जो खिला था
क़सम ख़ुदा की
बड़ा ही दिलकश
बहुत हसीं था...!!
4 अगस्त, 2016
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