शनिवार, 13 अगस्त 2022

ग़ज़ल- 2/ तेरे एहसास में डूबा हुआ मैं

तेरे एहसास में डूबा हुआ मैं

कभी सहरा कभी दरिया हुआ मैं


तेरी नज़रें टिकी थीं आसमाँ पर

तेरे दामन से था लिपटा हुआ मैं


खुली आँखों से भी सोया हूँ अक्सर

तुम्हारा रास्ता तकता हुआ मैं


बहुत पुर-ख़ार थी राह-ए-मोहब्बत

चला आया मगर हँसता हुआ मैं


कई दिन बाद उस ने गुफ़्तुगू की

कई दिन बा'द फिर अच्छा हुआ मैं 


किताब: क्या तुम्हें याद कुछ नहीं आता

पृष्ठ संख्या: 27

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