शनिवार, 13 अगस्त 2022

ग़ज़ल-3/ जब भी यादों का उभरता है क़मर शाम के बाद

जब भी यादों का उभरता है क़मर शाम के बाद

दिल में उठते हैं उदासी के भँवर शाम के बाद


कौन चेहरे से हटाता है मुखौटे दिन में

सामने आते हैं पोशीदा हुनर शाम के बाद


दोस्तों को भी नहीं याद हमारी गलियाँ

और अब हम भी नहीं जाते उधर शाम के बाद


खींच ले जाती है क़दमों को कोई मजबूरी

कौन करता है ख़ुशी से यूँ सफ़र शाम के बाद


हैं ये फुटपाथ के बिस्तर ही मुक़द्दर कुछ के

सब नहीं लौट के जा पाते हैं घर शाम के बाद


किताब: क्या तुम्हें याद कुछ नहीं आता

पृष्ठ संख्या: 28

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